बच्चे को तरस रहे नि:संतान दंपतियों के लिए अब मौजूद हैं 4 विकल्प

नि:संतानता जीवन का एक ऐसा दंश है, जिसकी चुभन संतान नहीं होने तक बनी रहती है। संतान नहीं पाने वाले दम्पती केवल मानसिक एवं भावनात्मक तनाव में रहते हैं बल्कि सामाजिक परेशानियों का भी सामना करते हैं। दुनियाभर में 20 प्रतिशत से अधिक दम्पतियों को गर्भधारण में अड़चनें आती हैं। प्रजनन क्षमता को लेकर लोगों में आधी-अधूरी जानकारियां और कई गलतफहमियां व्याप्त है, इसके चलते भी लोग नि:संतानता के इलाज में देरी कर देते हैं। हम आपको बताएंगे क्या है नि:संतानता, कौन से कारण इसके लिए जिम्मेदार हैं और उपचार के ऐसे तरीके मौजूद हैं जिनसे नि:संतानता को दूर किया जा सकता है और स्वस्थ्य संतान की प्राप्ति की जा सकती है।

क्या है नि:संतानता

मेडिकल टर्म में अगर कोई दम्पत्ति बिना किसी साधन का इस्तेमाल किए दो साल या इससे भी अधिक समय तक फिजिकल रिलेशनशीप बना रहा है और उसके बाद भी गर्भधारण नहीं हो रहा है तो इसे नि:संतानता कहा जाएगा। वर्ष 2015 की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रजनन उम्र वाले 27.5 मिलियन दम्पती नि:संतानता से ग्रस्त है। इसमें 40 से 50 फीसदी नि:संतानता की वजह महिला में और 30 से 40 फीसदी कारण पुरुषों में बढ़ा है।इनफर्टिलिटी की बढ़ती वजह शहरीकरण, पर्यावरणीय एवं जीवनशैली को प्रभावित करने वाले कारक हैं। पर्यावरणीय कारण में मिलावट, रासायनों का शरीर में जाना, प्रदूषित पानी एवं हवा है वहीं जीवनशैली के कारकों में तनाव, जरूरत से ज्यादा काम, कुपोषण, मोटापा, एल्कोहल, धूम्रपान देर से शादी होना यौन संक्रमित बीमरियां गोनोरिया आदि है।

पुरुष नि:संतानता के कारण

डॉ. पवन यादव, जो कि इंदिरा आईवीएफ के लखनऊ सेंटर में चीफ आईवीएफ स्पेशलिस्ट एंड लेप्रोस्कोपी सर्जन है वह बताते हैं कि पुरुषों में नि:संतानता की वजह शुक्राणुओं की गिनती कम होना, गति कम होना, नहीं होना अथवा शुक्राणु का टेस्टीज में बनना है। एम्स की एक स्टडी कहती है कि तीन दशक पहले जहां वयस्क पुरुष में स्पर्म काउंट 60 मिलियन प्रति एमएल.था वह घट कर 20 मिलियन प्रति एमएल. रह गया। रिप्रोडक्टिव हैल्थ की वर्ल्ड कांग्रेस में बताया गया कि तनाव, पर्यावरण एवं औद्योगिक प्रदूषण से पुरुषों में स्पर्म की गुणवत्ता कम हुई है।
लाईफ स्टाईल के दुष्प्रभाव -काम का दबाव, अधिक घंटो तक काम करना, तनाव, आधुनिक जीवन शैली, फ्रेक्ट्रियों, भट्टियों के पास काम करना, पौष्टिक आहार की कमी, ड्रग्स, नशा, धूम्रपान आदि भी पुरूषों में शुक्राणुओं की संख्या को कम करने के महत्वपूर्ण कारक हैं। बॉडी बनाने के लिए स्टीरॉयड लेना, यौन संक्रमित बीमारियां भागदौड़ भरी जीवन शैली के कारण कम उम्र के पुरूषां में भी शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता में कमी सामने आयी है। निरंतर लैपटॉप पर काम करने से यही नहीं कॉपोर्रेट सेक्टर में काम करने वाले जो लोग जांघों पर लैपटॉप रखकर काम करते हैं वो भी इसके शिकार हो सकते हैं।

महिला नि:संतानता के कारण


डॉ. दीपिका मिश्रा, जो इंदिरा आईवीएफ  (Indira IVF) के वाराणसी सेंटर में गायनेकोलॉजिस्ट एंड आईवीएफ स्पेशलिस्ट है उनके अनुसार भारतीय महिलाओं में इनफर्टिलिटी के मुख्य कारणों में पीसीओएस [पॉली सिस्टिक आॅवरी सिंड्रोम], ओवरियन सिंड्रोम, मोटापा, गर्भाशय की अंदरुदनी परत [एंडोमीट्रियम ] के गर्भाश्य की दीवार के भीतर जाने से हुई सूजन, ट्यूब में ब्लॉकेज आदि है। यही नहीं, इनफरटाइल महिलाओं में से 18 फीसदी महिलाएं जननांगों की टीबी की शिकार है जो ट्यूब ब्लॉकेजल एंडोमीट्रियल क्षतिग्रस्त होने का एक बड़ा कारण है। 

ब्रिटेन के यूरोपियन सोसाइटी आॅफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एंब्रयोलॉजी की रिपोर्ट के अनुसार शिफ्ट में काम करने, धूम्रपान करने, देर से शादी करने जरूरत से ज्यादा वर्क लोड तनाव लेने वाली महिलाओं में से 33 प्रतिशत महिलाओं को अनियमित मासिक धर्म की समस्या हो जाती है और उन 33 फीसदी में से 80 फीसदी को कंसीव करने में बेहद समस्या आती है। जरूरत से ज्यादा स्ट्रेस लेने वाली महिलाओं में हार्मोनल चेंज होते हैं, उस वजह से भी बांझपन की शिकार होने का खतरा उनमें रहता है।

नि:संतानता के लिए महिला में चार जांचें हार्मोन का स्तर, गर्भाश्य की अल्ट्रासाउण्ड, अण्डों की जांच ट्यूब की जांच महत्वपूर्ण है।वहीं पुरुष में शुक्राणुओं की जांच में चार चीजें जानना अहम है जिसमें शुक्राणुओं की संख्या, गुणवत्ता, गतिशीलता उनकी  जीवितता है।
फर्टिलिटी बढ़ाने के लिए सर्जरी

डॉ. अंजलि गहलान, जो कि इंदिरा आईवीएफ के इलाहबाद सेंटर में चीफ इन फर्टिलिटी एंड आईवीएफ स्पेशलिस्ट है वह कहती है कि अत्याधुनिक तकनीक के आगमन के साथ फर्टिलिटी को बढ़ाने के लिए 'न्यूनतम इनवेसिव' कम से कम चीरफाड़ की सर्जरी एक विकल्प के रूप में उभरी है। इसमें महिला नि:संतानता को दूर करने के लिए लेप्रोस्कोपी और हिस्टेरोस्कोपी दो तरह की सर्जरी मुख्य रूप से काम में ली जा रही है। इन सर्जरी में जांच रिपोर्ट के समय ही हाथोंहाथ विशेषज्ञ डॉक्टर इस सर्जरी से फर्टिलिटी को बढ़ाने का रास्ता तैयार कर देते हैं।

लेप्रोस्कोपी-


इसमें एक दूरबीन लप्रोस्कोप होता है जिससे कैमरे जुड़े होते हैं। यह अंडाशय को देखने के लिए, पेट के अंदर गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब के बाहर की स्थिति दिखाता है। लेप्रोस्कोपी का उपयोग नि:संतानता के कारणों को जांचने मसलन पैल्विक दर्द, पेट दर्द, फैलोपियन ट्यूब में रुकावट आदि के लिए किया जाता है। डॉक्टरों इस तकनीक का उपयोग सिस्ट, एंडोमीट्रियम और फाइब्रॉएड के इलाज के लिए भी करते हैं।

हिस्टेरोस्कोपी-


हिस्टेरोस्कोप नामक उपकरण जिससे कैमरा जुड़ा होता है, गर्भ के अंदर देखने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह उपकरण गर्भाशय के अन्दर मूव करते हुए असामान्य रक्तस्राव के कारण का पता लगाता है और गर्भाशय में असामान्य वृद्धि जैसे फाइब्रॉएड और पॉलिप को दूर करता है।  

 फॉलिक्यूलर मॉनिटरिंग-अंडे के ब्लॉस्ट होने तक की स्टडी


अंडाशय में अंडे की पहचान ओव्यूलेशन तक करने के लिए फॉलिक्यूलर अध्ययन एवं निगरानी की जाती है। संतान प्राप्ति की प्रक्रिया में यह एक महत्वपूर्ण ट्रीटमेंट है। ओव्यूलेशन वह समय है जो गर्भधारण की संभावना को अधिकतम व्यक्त करता है। यह अंडाशय, गर्भाशय और गर्भाश्य लाइनिंग के अध्ययन करने के लिए योनि के अंदर किया गया एक अल्ट्रासाउण्ड स्कैन है।
इस ट्रीटमेंट में महिला के मासिक धर्म के दूसरे दिन ट्रांसवेजाइनली फॉलिक्यूलर स्कैन किया जाता है। इसके बाद नियमित अंतराल पर इसे रिपिट किया जाता है। दसवें दिन अंडे का अधिकतम व्यास देखा जाता है। करीब 12 वें दिन यह 18 एमएम. का हो जाता है। इसके बाद 18 वें दिन इसे इंजेक्शन से क्रेक किया जाता है। अंडा टूटने

के 36 घंटे के बाद गर्भधारण के योग्य हो जाता है। इस तरह से  फॉलिक्यूलर स्कैन गर्भाशय, गर्भ, एंडोमीट्रियम की लाइनिंग, दोनों अंडाशय, पेल्विक एरिया आदि की साइज, शेप निर्धारित करता है। यह स्कैन उन फॉलिकल के आकार को मापने में उपयोगी होता है जिन्हें अंडाशय में होने के लिए 18-24 मिमी के बीच पहुंचने की आवश्यकता होती है। इस स्कैन से फॉलिकल के टूटने की अवधि पता चल जाती है जिससे ओव्यूलेशन अवधि की भविष्यवाणी कर सकते हैं, जो गर्भधारण को अधिकतम करने के लिए संभोग में मदद कर सकते हैं।

क्या है नि:संतानता के इलाज के विकल्प


नि:संतानता के क्षेत्र में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने कई समाधान प्रस्तुत किए हैं। पिता बनने के विकल्प के रूप में इन्ट्रायूरीन इनसेमिनेशन [आईयूआई], इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन [इक्सी] इन विट्रोफर्टिलाइजेशन [आईवीएफ] तकनीक है जो काफी सेफ सटीक है। कौनसी तकनीक किस दम्पति के लिए सेफ और कारगर है, यह निर्णय विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा कई बार महिला की स्थिति देख कर भी लिया जाता है। 

आईयूआई तकनीक


कई बार देखा जाता है कि पुरुषों के स्पर्म (शुक्राणु) अच्छी हालत में नहीं होते या इंटरकोर्स के समय ओवरी के बाहर ही रह जाते हैं। ऐसे में इस तकनीक के जरिए स्पर्म को बाहर लैब में अच्छी तरह धोकर उनमें से अच्छे स्पर्म छांटकर सीधे महिला के गर्भाश्य में डाल दिए जाते हैं। यह तकनीक उन कपल्स के लिए ठीक है जिनमें स्पर्म बहुत कम हों या खराब हों। अगर स्पर्म कम हैं तो स्पर्म बैंक के जरिए गर्भधारण कर सकते हैं। अगर पुरुष किसी बीमारी से पीड़ित है तो भी स्पर्म खराब हो सकते हैं। ऐसे में डोनर बैंक से स्पर्म लेकर कर प्रेग्नेंसी हो सकती है। इसमें महज 24 घंटे यानी एक दिन। का समय लगता है। स्पर्म फर्टिलाइज होने के बाद उसे महिला के गर्भाश्य में डाल दिया जाता है।

इक्सी तकनीक


इस तकनीक में पुरुष के स्पर्म और महिला के अंडे को बाहर फर्टिलाइज किया जाता है। सिर्फ एक स्पर्म को नली के जरिए अंडे के बीचोबीच डाल दिया जाता है। फर्टिलाइज होने के बाद उसे यूटरस में डाल दिया जाता है। यह तकनीक तब इस्तेमाल की जाती है जब महिला में सब कुछ ठीक हो, लेकिन पुरुष में बिल्कुल स्पर्म हों। इस विधा में किसी तीसरे आदमी के स्पर्म इस्तेमाल किए जाते हैं। ऐसे में स्पर्म बैंक या स्पर्म डोनर की भी मदद ले सकते हैं। इस तकनीक में स्पर्म बाहर अच्छी तरह फर्टिलाइज करने में 2-3 दिन लग जाते हैं। उसके बाद उसे यूटरस में डाल दिया जाता है। 

आईवीएफ तकनीक


इस तकनीक को टेस्ट ट्यूब बेबी प्रक्रिया[आई.वी. एफ.] के नाम से भी जाना जाता है। जब गर्भधारण के बाकी उपाय नाकाम रहते हैं, तब यह इलाज कारगर साबित हो सकता है।

टेस्ट ट्यूब बेबी प्रक्रिया[आई.वी. एफ.] यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अण्डे शुक्राणुओं को शरीर से बाहर फर्टिलाइज कराया जाता है। इस प्रक्रिया में महिला के अण्डाशय में सामान्य से अधिक अण्डे विकसित किए जाते हैं। जिन्हें बाद में एम्ब्रियोलॉजी लैब में फर्टिलाइज करवाकर भ्रूण विकसित किया जाता है और इस भ्रूण को 2-5 दिन लैब में ही विकसित कर महिला के गर्भाश्य में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।

मीनोपॉज के बाद भी बनें मां



कई बार महिला की जीवन शैली, अधिक कसरत, तनाव अथवा पीसीओडी, थॉयराइड का कम ज्यादा होना,पिट्यूटरी ट्यूमर आदि के कारण हार्मोनिक लेवल अनियंत्रित हो जाता है जिससे उसका आॅव्यूलेशन प्रभावित होता है और उसका मासिक आना बंद हो जाता है। आमतौर पर महिला में 50 वर्ष की उम्र के बाद मीनोपॉज होता है लेकिन कई कारणों से 40 वर्ष के भीतर ही महिला में ओव्यूलेशन होना बंद हो जाता है। मां बनने की इच्छा रखने वाली ऐसी महिलाएं अब आई.वी. एफ. की मदद से अधिक उम्र में भी मातृत्व सुख प्राप्त कर सकती है। अधिक उम्र वाली महिलाओं की जांच कर फिर से उनकी माहवारी शुरू की जाती है तथा किसी अन्य स्वस्थ महिला से प्राप्त अण्डों की मदद से आई.वी. एफ. प्रक्रिया पूरी की जाती है।

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